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चाणक्य सूत्र |चाणक्य नीति|


सूत्र : सुखस्य मूलं धर्मः ॥01॥
अन्वय : धर्मः सुखस्य मूलम् ।
अर्थ : सुख का मूल धर्म है ।

विवेचन : संस्कृत की 'धृ धारणे' धातु से निष्पन्न इस शब्द का प्रयोग धारण करना, शुभ कर्म, मज़हब, रिवाज, कर्त्तव्य, न्याय, प्रकृति आदि अर्थों में सामान्य रूप से किया जाता है । 'यतोऽभ्युदय निःश्रेयस: सिद्धिः स धर्म:' वह कर्म जिसके करने से, करने वाले का, इस लोक में अभ्युदय (उन्नति) हो और परलोक में मोक्ष की प्राप्ति हो, उसे धर्म कहते हैं।
आचार्य चाणक्य नीति शास्त्र के ज्ञाता थे। उनके अनुसार धर्म से अभिप्राय उन सिद्धान्तों, नियमों और नीतियों से है जिन पर समाज का ढांचा टिका हुआ है । सिद्धान्त-विहीन समाज रेत के ढेर की तरह बिखर जाता है। धर्म पूर्वक अर्जित धन से सुख की प्राप्ति होती है । 'प्रत्येक प्राणी अपने अपने कर्त्तव्य (धर्म) का पालन करते हुए सौ साल जीने की इच्छा करे', ऐसा श्रुति का भी कथन है । नीति का अनुसरण किए बिना सच्चा सुख प्राप्त नहीं हो सकता । दूसरों के धर्म (कर्त्तव्यों) में झांकने की अपेक्षा अपने धर्म का पालन करने में ही सुख निहित है । अत: आचार्य ने धर्म को ही सुख का मूल माना है।








सूत्र : धर्मस्य मूलमर्थः ।।02।।
अन्वय : अर्थ: धर्मस्य मूलम् ।
अर्थ : धर्म का मूल अर्थ है ।

 विवेचन :अर्थ से अभिप्राय है धन अथवा राजकोष । धर्म की स्थापना एवं सुरक्षा के लिए भरपूर राजकोष का होना आवश्यक है । उचित साधनों से इक्ट्ठा किया गया धन ही धर्म की नींव को मजबूत बनाता है । राष्ट्र को चलाने वाली नीतियों को लागू करने एवं उन्हें सुरक्षित रखने के लिए धन मुख्य-साधन माना गया है । सम्पन्न राष्ट्र खुशहाल होते हैं । लोगों का जीवन-यापन सामान्य रूप से चलता है । राजकोष में दरिद्रता आने से अधर्म बढ़ता है । लोगों में लूट-पाट की प्रवृत्ति पनपने लग जाती है ।त: धर्म पूर्वक राजकोष में धन की वृद्धि करते रहना, समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए जरूरी है।


सूत्र : अर्थस्य मूलं राज्यम् ।।3।।
 अन्वय : अर्थस्य मूलम् राज्यम् ।
अर्थ : अर्थ (धन-सम्पत्ति) का मूल राज्य है।

 विवेचन : मजबूत एवं स्थिर राज्य का ही राजकोष भरपूर रहता है आर्थिक रूप से सम्पन्न राष्ट्र, लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सुरक्षा का प्रबल सुचारू ढंग से करते हैं । इस से प्रजा में सन्तोष रहता है । इसके अतिरिक्त शासन व्यवस्था को चलाने के लिए सेना, मंत्री, संचार एवं यातायात आदि के साधनों एवं राजकर्मचारियों की जरूरत होती है। इन सब कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है स्थिर एवं सम्पन्न राज्य से ही टैक्स (कर) आदि लेकर राजकोष में वृद्धि की जा सकती है । शासक और प्रजा दोनों का हित समृद्ध राजकोष पर निर्भर है।

सूत्र : राज्यस्य मूलमिन्द्रियजयः ॥4॥
अन्वय: राज्यस्य मूलम् इन्द्रियजयः ।
अर्थ राज्य का मूल इन्द्रिय जय अर्थात् संयमी होना है।

 विवेचन: शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध; इन पाँच विषयों को ग्रहण करने वाली; कान, त्वचा, चक्षु, जीभ एवं नाक, इन्द्रियों को ज्ञानेन्द्रिय कहा जाता है।
 इनके अतिरिक्त हाथ, पाँव, मुंह, गदा एवं लिंग को कर्मेन्दिय के नाम से जाना जाता है। मन को भी इन्द्रियों में ही गिना जाता है । इन ग्यारह इन्द्रियों को संयम में रखने का नाम ही इन्द्रिय जय है।
मन प्राणी को बाहरी विषयों की ओर प्रेरित करता है । जो इनक वशीभूत हो जाता है वह व्यक्ति विलासी. लोभी. दम्भी एवं स्वार्थी बन कर नीति सम्मत धर्म से पतित हो जाता है । जिस राष्ट्र व समाज कलाग कर्मचारी विलासी तथा स्वार्थी हो जाते हैं वह राष्ट्र भीतर से खोखला हाका रेत के घर की तरह बिखर जाता है। राजकोष एवं शासक तभी सुरक्षित सकते हैं, जब राष्ट्र के सामान्य लोग, समस्त कर्मचारी तथा अधिकारा संयम में रहें।




सत्र : इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः ।।5।।
अन्वय : इन्द्रियजयस्य मूलम् विनयः ।
 अर्थ : इन्द्रियजय का मूल विनय (विनम्रता) है।


 विवेचन:  विनम्रता से इन्द्रियों को वश में रखा जा सकता है । ग्यारह इन्द्रियों में 'मन' ही सबसे अधिक चंचल माना गया है । यही कान, आँख आदि इन्द्रियों को अपने अपने विषयों में समाये रहने का परामर्श देता रहता है । परिणाम स्वरूप व्यक्ति अपने कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य को भूल जाता है।

आचार्य चाणक्य ने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने से पहले विनम्र बनने की सीख दी है । विनम्र व्यक्ति अपने मन से दम्भ-मोह आदि विकारों को निकाल देता है एवं उसका मन स्फटिक मणि की भांति निर्मल होकर सद् असद् का भेद समझ लेता है । मन के काबू में आ जाने पर अन्य इन्द्रियां स्वयं ही संयम में रहने लगती हैं।
विनीत मनुष्य की बुद्धि एवं विवेक स्थिर होते हैं । स्थिर बुद्धि से लिए गये निर्णय सुखद परिणाम वाले होते हैं । इसके विपरीत मन के अधीन विचरने वाले मुनष्य काम, क्रोध आदि विषयों के जंजाल में फंसकर नीति- पथ से पतित हो जाते हैं । अत: प्रत्येक कर्मचारी एवं अधिकारी को विनम्र बने रहने का परामर्श दिया गया है।

मातृ दिवस (Mother Day ) पर जानिए महिलाओ के बारे में आचार्या चाणक्य जी ने क्या कहा हैं. स्त्री विचार: 


 स्त्री जाति से सम्बन्ध रखने वाले लगभग पच्चीस सूत्र हैं । इन में से तीन सत्रों में मां की महिमा का वर्णन किया गया है। माता को गुरुओं की भी गुरू कहा गया है। उसकी सेवा तथा सन्मान करने के लिए लोगों को प्रेरित किया गया है। मां ही जननी के रूप में बच्चे को जन्म देकर इस संसार में लाती है। हर एक बच्चे का कर्तव्य है कि वह अपनी माता की देखभाल करे। भारतीय विचारधारा में जननी एवं जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बड़ा माना गया है। इसी परम्परा की पुष्टि चाणक्य ने अपने सूत्रों में की है।
अन्य सूत्रों में स्त्री के स्वभाव के विषय में चर्चा की गई है। विधाता ने स्त्री को कोमलता प्रदान की है। स्त्री के बिना मनुष्य अपूर्ण माना गया है। चाणक्य का कथन है कि स्त्री के बधंन से छुटकारा पाना कठिन है। लज्जा को स्त्रियों का आभूषण कहा गया है। परिवार की देखभाल तथा पालन-पोषण करना उनका धर्म है। गृहस्थी की गाड़ी सुचारू रूप से चलाने के लिए कार्य-व्यापार करना मनुष्य के लिए अनिवार्य है। मेहनत एवं ईमानदारी से अर्जित धन से परिवार का पालन-पोषण करना स्त्रियों का धर्म है। 
चाणक्य के समय में स्त्री-शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। स्त्री शिक्षा के अभाव में स्त्रियों की जीवन-चर्या घर की चार दीवारी तक ही सीमित होकर रह गई थी। सह शिक्षा के विषय में चाणक्य का मत था कि लड़कों और लड़कियों को इकट्ठे पढ़ाना उचित नहीं। उनके लिए अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए। 
 उस जमाने में स्त्रियों को सक्रिय राजनीति में भाग लेने की आज्ञा नहीं थी। राजनीति की कूट चालों से उसे दूर रखा जाता था। चाणक्य का मानना था कि स्त्रियों का स्वभाव चंचल एवं अस्थिर होता है। अत: उसे कूटनीति के गुप्त - रहस्यों से परिचित न करवाया जाये। स्त्री के कोमल एवं अस्थिर स्वभाव को देखते हुए ही उसे राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखा गया था। यह भी संभव है कि चाणक्य के काल से पहले स्त्रियों को वे सभी अधिकार प्राप्त हों जो आजकल विकसित तथा विकासशील देशों की स्त्रियों को प्राप्त है। कुछ समय बाद स्त्रियों को दिये गये राजनीतिक अधिकारों के परिणाम ठीक न निकलने पर उन पर पाबंदी लगा दी गई हो, क्योंकि निषेध तभी किया जाता है जब कोई कार्य हो रहा हो। यह विवाद का विषय है। तत्कालीन साहित्य एवं सामाजिक परिस्थितियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस जमाने में स्त्रियों को सक्रिय राजनीति में भागीदार नहीं बनाया जाता था।

सूत्र : विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा ।।6।।
अन्वय : विनयस्य मूलम् वृद्ध उपसेवा ।
अर्थ : विनम्रता का मूल बूढ़े लोगों की सेवा है।


 विवेचन : वयोवृद्ध एवं धर्मवृद्ध लोगों की सेवा और संगत करने से विनम्रता का गुण ग्रहण किया जा सकता है । आयु के बढ़ने से सफेद बालों वाले लोग वयोवृद्ध कहे जाते हैं । कर्त्तव्य एवं अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाले पुरुष किसी भी आयु में धर्म- वृद्धों की गिनती में आ जाते हैं। ऐसे धर्मवृद्धों एवं वयोवृद्धों के पास बैठने एवं उनकी सेवा करने से विनम्रता आती है। 'अभिवादनशील एवं वृद्धों की सेवा करने वाले व्यक्ति की आय, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं' ऐसा मनु का कथन है । वयोवृद्ध अपने अनुभवों के आधार पर युवाओं को कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का ज्ञान करवाने में सक्षम होते हैं।
'विद्या से विनीत शासक, सब प्राणियों के हित में लगा हुआ, निष्कंटक पृथिवी का चिरकाल तक उपभोग करता है।' (अर्थ शास्त्र) ।



सूत्र : वृद्धसेवया विज्ञानम् ।।7।।
अन्वय : वृद्ध सेवया विज्ञानम्
अर्थ : वृद्धों की सेवा से विज्ञान (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य) की जानकारी मिलती है।



विवेचन : नीति शास्त्र में कहा गया है,जिस सभा (बैठक) में वृद्ध नहीं होते वह सभा नहीं कही जा सकती, वे वृद्ध नहीं कहे जा सकते जो धर्म (सत्य असत्य, कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य) के कहने में संकोच करते हैं, वह धर्म नहीं जिसमें सत्य नहीं, वह सत्य नहीं कहा जा सकता जिसमें छल या धोखा छिपा रहता है।



सूत्रकार के कहने का भाव है कि धर्म-वृद्ध व्यक्ति ही विज्ञानवान होते हैं एवं उन्हीं के सम्पर्क से भले-बुरे की पहचान करने का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । सफल- शासक बनने के लिए सद् असद् विवेक बुद्धि का होना अनिवार्य है । कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य के विवेक से हीन बड़े से बड़ा शासक भी नष्ट हो जाता है।



सूत्र : विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत् ।।8।।
अन्वय : विज्ञानेन आत्मानम् सम्पादयेत्
अर्थ : वृद्धों से विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करके शासक अपना शासनकार्य सम्पादन करें।


 विवेचन : आत्म - सम्पादन का अर्थ है काम क्रोध लोभ, मोह, मद और ईर्ष्या आदि छ: शत्रुओं का सर्वथा त्याग करके अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करना । वृद्धों की सेवा - संगति से बुद्धि को विकसित करके गुप्तचरों द्वारा अपने और पराये राष्ट्र की व्यवस्था पर नजर रखना । विद्या के प्रचार-प्रसार से प्रजा को विनीत बनाते हुए लोक  प्रिय बने रहकर अपने कर्तव्यों का  सावधानी से धर्म पूर्वक पालन करना । इस तरह आत्म-संयमी शासक अपनी प्रजा का प्रिय बनकर सुखचैन से अपना राजकार्य चलाता है।

सत्र : सम्पादितात्मा जितात्मा भवति ।।9।।
अन्वय : सम्पादित आत्मा जितात्मा भवति ।
अर्थ : सम्पादित आत्मा जितात्मा होता है ।


 विवेचन : नीति एवं विज्ञान से युक्त व्यवहार करने वाले मनुष्य को सम्पादित आत्मा कहा गया है । जितात्मा व्यक्ति अपनी कुप्रवृत्तियों पर अंकुश लगा कर उन्हें अपने वश में कर लेता है । ऐसा चरित्रवान शासक लोगों का सम्माननीय एवं पूजनीय बन जाता है । शासन-कार्य स्वयं ही सुचारू रूप से चलने लग जाता है । बृहस्पति का कथन है कि राजा 'आत्मवान बने' अर्थात् शासक अन्य लोगों पर शासन करने से पहले अपने ऊपर शासन करना सीखे । क्योंकि जो अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों को ही काबू में नहीं रख सकता वह सागर तक फैली धरती को कैसे जीत सकता है ? लोगों की कुप्रवृत्तियों को कुचलने से पहले अपनी समस्त मानवीय कमजोरियों पर अंकुश रखना शासक के लिए आवश्यक है।


सूत्र : जितात्मा सर्वाथैः संयुज्येत् ||10।।
अन्वय : जित आत्मा सर्व अर्थ: संयुज्येत्
अर्थ : जितात्मा सब प्रकार के सुख-साधनों से सम्पन्न जीवन-यापन करे ।


 विवेचन : जितेन्द्रिय पुरुष जिस किसी भी काम में हाथ डालता है, उसे सफलता पूर्वक पूरा करता है । ऐसे उद्यमी एवं संयमी पुरुष के पास सम्पत्ति स्वयं चली आती है । धर्म के अनुसार अर्जित सम्पदा से वह सभी प्रकार के सुरखों का आनन्द प्राप्त करता है । चाणक्य का कहना है कि धर्म और अर्थ के अनुसार ही काम अर्थात् सुख का सेवन करें । परन्तु सुख का सेवन करते हुए अपने कर्त्तव्य एवं अपनी आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखें।
गुणवान व्यक्ति ही शासन का अधिकारी माना जाता है । गुणहीन को शासनाधिकार मिल जाने पर प्रजा में असंतोष, पारस्पारिक वैमनस्य एवं  स्वार्थपरता व्याप्त हो जाते हैं ।



सूत्र : अर्थसंपत् प्रकृतिसंपदं करोति ।।11।।
अन्वय : अर्थसम्पत् प्रकृति सम्पदम् करोति ।
अर्थ : शासक की समृद्ध आर्थिक दशा सामान्य लोगों में खुशहाली लाती है।


 विवेचन : प्रकृति शब्द से अभिप्राय है प्रजा अथवा सामान्य लोग । जो राष्ट्र सब प्रकार के भौतिक साधनों से सम्पन्न हैं वहाँ के लोग भी आमतौर पर खुशहाल देखे जाते हैं । विकसित देशों के नागरिकों के पास विकासशील देशों की अपेक्षा अधिक भौतिक सुख-साधन उपलब्ध हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न राष्ट्र में विकास योजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं। लोगों को अपना अपना काम करने के लिए सरलता पूर्वक अवसर मिलता है । सामान्य जन-जीवन के स्तर में वृद्धि होती है।




सूत्र : प्रकृति सम्पदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते ॥12।।
 अन्वय : हि प्रकृति सम्पदा अनायकम् अपि राज्यम् नीयते ।
 अर्थ : खुशहाल, नीति सम्पन्न एवं गुणी नागरिक, शासक के विद्यमान न रहने पर भी, शासन-व्यवस्था सुचारू
ढंग से चला लेते हैं।


 विवेचन: 'यथा राजा तथा प्रजा'  नीतिवान, संयमी एवं दूरदर्शी शासक की मंत्री परिषद् एवं अन्य अधिकारी गण भी संयमशील एवं विवेकी होते हैं। अगर किसी कारणवश शासक कछ समय के लिए शासन-व्यवस्था की देख-रेख नहीं कर सकता, तो उसके मंत्री एवं अन्य सलाहकार सुचारू रूप से शासन की बागडोर संभाल लेते हैं।नीतिवान शासक की प्रजा भी अपने अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा जागरूक रहती है।अत: लोगों के आर्थिक रूप पर समृद्ध एवं संयमशील होने पर बिना शासक के भी कुछ समय के लिए शासन व्यवस्था सामान्य रूप से चलती रहता।



सूत्र : प्रकृतिकोपः सर्वकोपेभ्यो गरीयान् ।।13।।
अन्वय : प्रकृतिकोप: सर्वकोपेभ्य: गरीयान् ।
अर्थ : जन-रोष सब प्रकार के कोपों से भयावह होता है।

 विवेचन : प्रजा में पैदा हुआ आक्रोश शासक के लिए सब प्रकार की हमेशा अपने अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखकर उनका मूल्यांकन करता रहे । अगर प्रजा में अपने शासक के प्रति आक्रोश की ज्वाला सुलगने लगे, तो उसे आसानी से शान्त नहीं किया जा 
सकता । लोगों की भलाई, उनकी सुख सुविधाओं का विकास, अच्छी शिक्षा के अवसर और नीतिवान बनने का प्रशिक्षण हमेशा देते रहना, प्रशासन का कर्तव्य है ।अत: समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी वर्ग का यह उत्तरदायित्व बन जाता है कि वे अपने अपने धर्म (कर्त्तव्य) का निर्वाह पूरी सतर्कता एवं सदभावना से करते रहें । महाकवि भारवि ने अपने काव्य 'किरातार्जुनीय' में दृष्टांत के माध्यम से प्रकृति प्रकोप को वृक्षों की टहनियों की रगड़ से पैदा होने वाली अग्नि के समान माना है जो पर्वत के समस्त पेड़ों को जला कर भस्म कर देती है । इसी प्रकार लोगों में पैदा होने वाला जनरोष भी शासन-व्यवस्था को तहस-नहस कर सकता है ।


सूत्र : अविनीतस्वामिलाभादस्वामिलाभः श्रेयान् ॥14॥
अन्वय : अविनीत स्वामि लाभात् अस्वामि लाभः श्रेयान् ।
अर्थ : उद्दण्ड एवं अयोग्य शासक के बिना ही 'प्रजा द्वारा शासन चलाना' अयोग्य शासक की अपेक्षा हितकर है।


 विवेचन: अयोग्य शासक के सत्तारूढ़ होने पर अराजकता पैर- पसारने लगती है । अराजकता आ जाने पर विनीत एवं बुद्धिमान अधिकारियों एवं मंत्रियों के सत्य एवं हितकारी परामर्श की अवहेलना होती है । परिणामस्वरूप लोलुप एवं स्वार्थी लोग चाटुकारिता से खुश रहने वाले शासक के चारों और अपना जाल बिछा लेते हैं । वे सत्ता पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेते हैं । ऐसी अवस्था आने पर 'अन्धेर नगरी, चौपट राजा' की उक्ति चरितार्थ हो जाती है। आचार्य चाणक्य का कथन है कि अयोग्य एवं अविनीत शासक को सत्ता सौंपने की बजाये ज्ञानवान, संयमी एवं परोपकार की प्रवृत्ति रखने वाले मंत्रियों एवं अधिकारियों को स्वयं ही शासन की बागडोर अपने हाथ में ले लेनी चाहिए, ताकि सामान्य जनजीवन सुचारू रूप से चलता रहे । भाव यह कि बुद्धिमान लोगों को मिल जुल कर सब की भलाई के लिए कदम उठाने चाहिए, जब तक सुयोग्य 
शासक को स्थापित न किया जा सके।

सूत्र : सम्पाद्यात्मानमन्विच्छेत् सहायवान् ।।15।।
अन्वय: आत्मानम् सम्पाद्य सहायवान् अन्विच्छेत् ।
अर्थ : योग्य गुणों को ग्रहण करके शासक अपने जैसे ही सयोग मंत्री नियुक्त करे।



विवेचन
: पहले सूत्रों में शासक के गुणों का वर्णन विस्तार से हो चुका है। उन सभी पूर्व-वर्णित गुणों को शासक अपनाएं एवं अपने जीवन का अंग बनायें । तदोपरान्त अपने जैसे ही गुणी मंत्री, पुरोहित एवं अधिकारी वर्ग को नियक्त करे । शासन-कार्य अकेले से नहीं चल सकता । मंत्रियों के परामर्श एवं अधिकारियों के सहयोग से योजनाएं पूरी की जाती हैं । अत: राजा के लिए जो गुण बताये गये हैं, वैसे ही संयमी, विवेकशील नीतिवान आदि गणों से सम्पन्न व्यक्तियों को ही महत्त्वपूर्ण पदों पर स्थापित करने का परामर्श इस सत्र में दिया गया है। बिना परखे उच्च पदों पर प्रतिष्ठित मंत्री एवं अमात्य शासक को कभी भी धोखा दे सकते हैं। अत: शासक अपने सहयोगियों का चयन स्वयं परीक्षा करके करे।



सूत्र : नासहाय मंत्र निश्चयः ॥16॥
अन्वय: असहाय मंत्र निश्चयः न ।
अर्थ: अकेला शासक राज-कार्य के जटिल विषयों पर उचित  निर्णय नहीं ले सकता।



विवचन: शासन व्यवस्था को सचारू रूप से चलाना आसान नहीं है। अनक प्रकार के अन्तर्देशीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर निर्णय लेने पड़ते है । एस। दुरूह तंत्र को सफलता पूर्वक चलाने के लिए सुयोग्य मंत्रि-परिषद् का आवश्यकता होती है।  चाणक्य ने अमात्य, मंत्री एवं प्रोहित का नियुक्ति बड़ी सावधानी से करने की सलाह दी है।

अमात्य और मंत्री शब्द आपातत: पर्याय प्रतीत होते है । परन्तु अमात्य किसी भी बुद्धिमान, सहपाठी, कार्यकुशल, व्यवहारज्ञ एवं नीतिनिपुण को बनाया जा सकता है। मंत्री से अभिप्राय है मंत्रणा देने वाला । विशेष कार्यों में मंत्रणा हर एक से नहीं की जा सकती। राजकीय काम-काज का चलाने वाले सर्वोपरि अधिकारी को अमात्य कहा जा सकता । वर्तमान म एस अधिकारी को मुख्य सचिव के पद से पुकारा जाता है।
विभज्यामात्यविभवं देशकालौ च कर्म च।
अमात्या: सर्व एवैते कार्याः स्युर्न तु मन्त्रिणः ।।
(अर्थशास्त्र)




सूत्र : नैकं चक्र परिभ्रमयति ॥17॥
अन्वय : एकं चक्रं न परिभ्रमयति ।
अर्थ : अकेले पहिये से गाड़ी नहीं चलती ।


 विवेचन: जैसे रथ को चलाने के लिए दोनों पहियों की समान रूप से आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शासक एवं मंत्रिपरिषद्, राष्ट्र- रूपी गाड़ी के दो पहिये होते हैं । एकतंत्र राज्य का रथ सचारू रूप से नहीं चलता । मनमाने ढंग से राज्य व्यवस्था चलाने वाला शासक परे ढांचे को ही बिगाड़ देता है, एवं समाज- व्यवस्था अनुशासनहीन होकर बिखरने लगती है।
शासन व्यवस्था मात्र राजा का ही पारिवारिक मामला नहीं है । शासन-तंत्र में शासक, प्रजा, मंत्री एवं अधिकारी आदि सभी सम्मिलित होते हैं । अत: इन सभी के सम्मिलित प्रयास से ही शासन की गाड़ी आगे बढ़ती है। इन सभी का संतुलित सहयोग एवं शक्ति राजकार्य चलाने के लिए अनिवार्य है।


सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेक न वर्तते । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् ।। (अर्थशास्त्र) महामंत्री, सेनापति, कोषाध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश; ये चार राज्य के सर्वश्रेष्ठ नागरिक, सब प्रकार की सेनाओं के एक एक मुखिया, पुरोहित एवं अमात्य आदि सहायक कहलाते हैं। इन सभी के सहयोग से ही शासन चलता है।


सूत्र : सहायः समदुःखसुखः ॥18॥
अन्वय : सहाय सम दुःख सुखः ।
अर्थ : दुख और सुख में साथ देने वाले को सहायक कहा जाता हैं


विवेचन: शासक के सहायक उसके मंत्री होते हैं । अन्य व्यक्ति भी सहायक हो सकते हैं । सुख-दुख में साथ देने वाले को सहायक कहा जाता है । दुख की घड़ी आने पर तटस्थ रहने वाला सहायक नहीं कहा जा सकता। शत्रु द्वारा अपने राज्य की आलोचना होने पर चुपचाप बैठने वाला व्यक्ति भी सहायक नहीं माना जा सकता । अपने शासक के दुःख को अपना दु:ख मानने वाला, एवं उसके सुख में सुख का अनुभव करने वाला व्यक्ति ही सहायक कहलाने  का अधिकारी है  शक्ति भेद से समशक्ति, हीन शक्ति सहायक कहलाने का अधिकारी है ।  तीन प्रकार के लोग सहायक हो सकते हैं,


 सूत्र: मानी प्रतिमानिनमात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् ।।19।।
 अन्वय : मानी प्रतिमानिनम् आत्मनि द्वितीयं मन्त्रम् उत्पादयेत् । अर्थ : स्वाभिमानी शासक, शासन सम्बन्धी समस्याएं पैदा होने पर, अपने भीतर ही विरोधी पक्ष या विपक्ष को पैदा  करे एवं उससे तर्क-वितर्क या संवाद करे।

 विवेचन: सूत्रकार का कथन है कि अगर किसी समय कोई ‘सहायक या मंत्री' विचार-विमर्श के लिए उपलब्ध न हो और समस्या पर विचार करना अनिवार्य हो, तब शासक अपने आप को अकेला अनुभव न करे । अपितु अपने अन्दर ही विपक्षी पैदा करके उससे समस्या के निदान की चर्चा करे । प्रत्येक दृष्टि से गौर करने के उपरान्त ही निर्णय ले । ऐसा परामर्श पहले सूत्रों में दिया जा चुका है। किसी भी विषय में अन्तिम निर्णय का दूसरा नाम ही 'मंत्र' है । राजा और मंत्री दोनों मिल कर ही अन्तिम निर्णय लेने के अधिकारी हैं। इनके इलावा तीसरे व्यक्ति को मंत्रणा में सम्मिलित होने का अधिकार नहीं है।
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता ।
 आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता । (गुप्त)

सूत्र : अविनीतं स्नेहमात्रेण न मंत्रे कुर्वीत ||20||
अन्वय : अविनीतम् स्नेहमात्रेण मंत्रे न कुर्वीत ।
अर्थ : कर्त्तव्य अकर्त्तव्य विवेक शून्य व्यक्ति को केवल मित्र या स्नेही होने के नाते से ही मंत्रणा में शामिल नहीं करना चाहिए।

 विवेचन :   राजकार्य सम्बन्धी विषयों में सलाह - मशवरा केवल उन्हीं मंत्रियों से लिया जाना चाहिए जिनकी नियुक्ति उनकी योग्यता एवं गुणों के आधार पर हो । कार्य - अकार्य का ज्ञान न रखने वाले से सलाह लेना ठीक नहीं। मित्रता या स्नेह रखना अलग बात है । राजकार्य चलाना अलग है । अत: मात्र दोस्ती या स्नेही के नाते किसी अन्य अनधिकारी को मंत्रणा में शामिल नहीं किया जाना चाहिए । चाणक्य का मानना है कि कार्य के सम्पादन की योग्यता से ही कर्ता की शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है।


सूत्र : श्रुतवन्तमुपधाशुद्ध मन्त्रिणं कुर्यात् ।।21।।
 अन्वय : श्रुतवन्तम् उपधाशुद्धम् मंत्रिणम् कुर्यात् ।।
 अर्थ : विद्वान एवं उपधाशुद्ध लोगों को ही मन्त्रि-पद पर प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए।

विवेचन :  अर्थशास्त्र के नौवें अध्याय में आचार्य चाणक्य ने मन्त्रियों की योग्यता का वर्णन करते हुए कहा है-, ‘मंत्री अपने ही देश का नागरिक, कुलीन, अच्छे सम्बन्धियों वाला, हाथी-घोड़े एवं रथ आदि वाहनों को चलाने की कला में निपुण, राजकीय कार्यों पर पैनी नजर रखने वाला, बुद्धिमान, दक्ष, प्रवक्ता, प्रत्युत्पन्नमति, स्मरणशक्ति-सम्पन्न, दबंग, प्रतिकार एवं प्रतिवाद करने में समर्थ, उत्साही तथा प्रभावशाली, कष्टों को सहन करने वाला, पवित्र हृदय, सबके साथ मधुर व्यवहार करने वाला, अपने स्वामि में दृढभक्ति रखने वाला, शीलवान, बलवान, निरोगी, धैर्यशाली, निरभिमानी, स्थिर, सौम्य स्वभाव, आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीति में पारंगत व्यक्ति होना चाहिए।'
उपधा शब्द से अभिप्राय है परीक्षा । जिस व्यक्ति का आचरण निम्नलिखित चार प्रकार की उपधाओं द्वारा शुद्ध अथवा प्रमाणित पाया गया हो, वह व्यक्ति ही अमात्य पद का योग्य उम्मीदवार होता है ।

धर्मोपधा : सामान्य शब्दों में इसे कर्त्तव्य - परीक्षा कहा जा सकता है । परीक्षा लेने के ढंग का वर्णन करते हुए आचार्य ने कहा है कि राजा अपने प्रधान मंत्री एवं पुरोहित के साथ मिलकर अन्य अमात्यों का परीक्षण गुप्त-रीति से करवायें । उदारहणार्थ पुरोहित की उपधाशुद्धि प्रमाणित करने के लिए उसे किसी अधम व्यक्ति के घर में हवन एवं यज्ञादि का अनुष्ठान करने के लिए आज्ञा दे । इस आदेश की अवहेलना करने पर परोहित को तत्काल पद से निलम्बित कर दे । तत्पश्चात् गढ पुरुषों द्वारा (सी.आई.डी. /आई.बी.) उस निलम्बित पुरोहित को राजा के विरुद्ध भडकाया जाये । बार बार भड़काने पर भी अगर वह पुरोहित उकसाने वाले गूढ पुरुषों का समर्थन नहीं करता तब उसे धर्मोपधा शुद्ध माना जाये ।
अर्थोपधा:  ऊपरोक्त रीति के अनुसार ही सेना व्यक्ति का सत्कार करने के लिए कहे । सेनापति के गद पुरुषों द्वारा एक एक अमात्य को धन का लोभ करने के लिए उकसायें । उस रुष्ट सेनापति को गप्त-विस यह भी कहें कि अन्य सभी अधिकारी एवं अमात्य इस राजा को करने के लिए तैयार हो चुके हैं । क्या आप भी उनसे सहमत है  अगर उन उकसाने वालों का समर्थन न करें तो उसे अर्थोपधा शुद्ध माना जाये।
भयोपधा : इस पर अन्य अमात्यों को तिरस्कृत एवं निलम्बित करते उनके पास छद्म वेश में गूढ पुरुषों को राजा के विरुद्ध बगावत के प्रेषित करे । अगर तिरस्कृत एवं निलम्बित अमात्य गूढ पुरुषों के तर्क का समर्थन न करें तो उन्हें भयोपधा शुद्ध माना जाये।
ऊपरोक्त उपधाओं से शुद्ध अमात्यों को भिन्न भिन्न प्रकार के शासकीय पदों पर नियुक्त करने का परामर्श आचार्य ने विस्तार पर्वक अर्थशास्त्र में किया है । विशेष कथन यह है कि उच्च पदों पर आसीन । सचिवों/अमात्यों की परीक्षा समय समय पर करते रहना चाहिए क्योंकि मानव-मन अत्यन्त चंचल एवं परिवर्तनशील है । कभी भी फिसल सकता है।



सूत्र : मन्त्रमूला: सर्वारम्भाः ।।22।।

अन्वय : मन्त्र मूला: सर्व आरम्भाः ।
अर्थ : सभी प्रकार के कार्य 'मंत्र' अर्थात् सम्यक् सोच-विचार के उपरान्त ही आरम्भ किए जाएं।


 विवेचन : ‘मन्त्र' का अर्थ है सम्यक् प्रकार से सोच-विचार कर लिए गये निर्णय । अर्थात् किसी भी योजना को प्रारम्भ करने से पहले उस विषय के विशेषज्ञों की सलाह लेना ही मंत्र कहलाता है । हर कार्य की सफलता का मूल सोच-विचार कर लिया गया निर्णय ही होता है । इसे ही आचार्य ने 'मंत्र' कहा है। शीघ्रता एवं बिना ठीक प्रकार से विचार किए बिना लिए गये निर्णय अनिष्टकारी होते हैं ।
 अर्थशास्त्र में मंत्र के पाँच अंगों का वर्णन किया गया है।
1. कर्मों का आरम्भ और उनके उपाय ।
 2. कर्मानुसार पुरुष एवं द्रव्यों का सम्पादन ।
 3. देशकाल विभाग-समय एवं स्थानानुसार योजना को लागू करना ।
4. विनिपात प्रतिकार-सम्भावित विघ्नों को दूर करने का प्रावधान ।
 5. कार्य सिद्ध-कार्य की सफलता ।
कार्य का मूल्यांकन उसकी उन्नति, अवनति तथा सम-अवस्था से किया जा सकता है । आवश्यकता अनुसार किसी भी योजना का इन तीन विधियों द्वारा मूल्यांकन किया जाता है ।


सूत्र : मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति ।।23।।
अन्वय : मन्त्ररक्षणे कार्य सिद्धिः भवति ।
अर्थ : मन्त्र को गुप्त रखने से कार्य सिद्धि होती हैं ।


 विवेचन: शासक के अनेक कार्य ऐसे होते हैं, जिन्हें जब तक वे पूरे न हो जायें, गुप्त रखने में ही भलाई निहित रहती है। कार्य सिद्धि से पहले प्रकट-मंत्र में विघ्न पड़ने की आशंका बनी रहती है। शत्रु पक्ष हर दम बढ़ते हुए शासक की नीतियों एवं परियोजनाओं पर नजर रखा करता है। अत: परियोजनाओं की पूर्ति तक उन्हें शत्रु पक्ष की नजरों से बचाने में ही भलाई मानी गई है। 'मन्त्र के मूल में ही विजय रहती है ऐसा देवगुरु बृहस्पति का कथन है। चाणक्य ने मंत्र भेद करने वाले मंत्री के लिए मृत्युदण्ड का विधान किया है। अत: गोपनीय कार्यों की चर्चा मात्र प्रधानमंत्री के साथ ही की जानी चाहिए।














 

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