सत्र : इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः ।।5।।
अन्वय : इन्द्रियजयस्य मूलम् विनयः ।
अर्थ : इन्द्रियजय का मूल विनय (विनम्रता) है।
मातृ दिवस (Mother Day ) पर जानिए महिलाओ के बारे में आचार्या चाणक्य जी ने क्या कहा हैं. स्त्री विचार:
स्त्री जाति से सम्बन्ध रखने वाले लगभग पच्चीस सूत्र हैं । इन में से तीन सत्रों में मां की महिमा का वर्णन किया गया है। माता को गुरुओं की भी गुरू कहा गया है। उसकी सेवा तथा सन्मान करने के लिए लोगों को प्रेरित किया गया है। मां ही जननी के रूप में बच्चे को जन्म देकर इस संसार में लाती है। हर एक बच्चे का कर्तव्य है कि वह अपनी माता की देखभाल करे। भारतीय विचारधारा में जननी एवं जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बड़ा माना गया है। इसी परम्परा की पुष्टि चाणक्य ने अपने सूत्रों में की है।
अन्य सूत्रों में स्त्री के स्वभाव के विषय में चर्चा की गई है। विधाता ने स्त्री को कोमलता प्रदान की है। स्त्री के बिना मनुष्य अपूर्ण माना गया है। चाणक्य का कथन है कि स्त्री के बधंन से छुटकारा पाना कठिन है। लज्जा को स्त्रियों का आभूषण कहा गया है। परिवार की देखभाल तथा पालन-पोषण करना उनका धर्म है। गृहस्थी की गाड़ी सुचारू रूप से चलाने के लिए कार्य-व्यापार करना मनुष्य के लिए अनिवार्य है। मेहनत एवं ईमानदारी से अर्जित धन से परिवार का पालन-पोषण करना स्त्रियों का धर्म है।
चाणक्य के समय में स्त्री-शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। स्त्री शिक्षा के अभाव में स्त्रियों की जीवन-चर्या घर की चार दीवारी तक ही सीमित होकर रह गई थी। सह शिक्षा के विषय में चाणक्य का मत था कि लड़कों और लड़कियों को इकट्ठे पढ़ाना उचित नहीं। उनके लिए अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए।
उस जमाने में स्त्रियों को सक्रिय राजनीति में भाग लेने की आज्ञा नहीं थी। राजनीति की कूट चालों से उसे दूर रखा जाता था। चाणक्य का मानना था कि स्त्रियों का स्वभाव चंचल एवं अस्थिर होता है। अत: उसे कूटनीति के गुप्त - रहस्यों से परिचित न करवाया जाये। स्त्री के कोमल एवं अस्थिर स्वभाव को देखते हुए ही उसे राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखा गया था। यह भी संभव है कि चाणक्य के काल से पहले स्त्रियों को वे सभी अधिकार प्राप्त हों जो आजकल विकसित तथा विकासशील देशों की स्त्रियों को प्राप्त है। कुछ समय बाद स्त्रियों को दिये गये राजनीतिक अधिकारों के परिणाम ठीक न निकलने पर उन पर पाबंदी लगा दी गई हो, क्योंकि निषेध तभी किया जाता है जब कोई कार्य हो रहा हो। यह विवाद का विषय है। तत्कालीन साहित्य एवं सामाजिक परिस्थितियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस जमाने में स्त्रियों को सक्रिय राजनीति में भागीदार नहीं बनाया जाता था।
सूत्र : वृद्धसेवया विज्ञानम् ।।7।।
अन्वय : वृद्ध सेवया विज्ञानम्
अर्थ : वृद्धों की सेवा से विज्ञान (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य) की जानकारी मिलती है।
सूत्र : विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत् ।।8।।
अन्वय : विज्ञानेन आत्मानम् सम्पादयेत्
अर्थ : वृद्धों से विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करके शासक अपना शासनकार्य सम्पादन करें।
सूत्र : जितात्मा सर्वाथैः संयुज्येत् ||10।।
अन्वय : जित आत्मा सर्व अर्थ: संयुज्येत्
अर्थ : जितात्मा सब प्रकार के सुख-साधनों से सम्पन्न जीवन-यापन करे ।
सूत्र : अर्थसंपत् प्रकृतिसंपदं करोति ।।11।।
अन्वय : अर्थसम्पत् प्रकृति सम्पदम् करोति ।
अर्थ : शासक की समृद्ध आर्थिक दशा सामान्य लोगों में खुशहाली लाती है।
सूत्र : प्रकृति सम्पदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते ॥12।।
अन्वय : हि प्रकृति सम्पदा अनायकम् अपि राज्यम् नीयते ।
अर्थ : खुशहाल, नीति सम्पन्न एवं गुणी नागरिक, शासक के विद्यमान न रहने पर भी, शासन-व्यवस्था सुचारू
ढंग से चला लेते हैं।
सूत्र : अविनीतस्वामिलाभादस्वामिलाभः श्रेयान् ॥14॥
अन्वय : अविनीत स्वामि लाभात् अस्वामि लाभः श्रेयान् ।
अर्थ : उद्दण्ड एवं अयोग्य शासक के बिना ही 'प्रजा द्वारा शासन चलाना' अयोग्य शासक की अपेक्षा हितकर है।
सूत्र : सम्पाद्यात्मानमन्विच्छेत् सहायवान् ।।15।।
अन्वय: आत्मानम् सम्पाद्य सहायवान् अन्विच्छेत् ।
अर्थ : योग्य गुणों को ग्रहण करके शासक अपने जैसे ही सयोग मंत्री नियुक्त करे।
विवेचन: पहले सूत्रों में शासक के गुणों का वर्णन विस्तार से हो चुका है। उन सभी पूर्व-वर्णित गुणों को शासक अपनाएं एवं अपने जीवन का अंग बनायें । तदोपरान्त अपने जैसे ही गुणी मंत्री, पुरोहित एवं अधिकारी वर्ग को नियक्त करे । शासन-कार्य अकेले से नहीं चल सकता । मंत्रियों के परामर्श एवं अधिकारियों के सहयोग से योजनाएं पूरी की जाती हैं । अत: राजा के लिए जो गुण बताये गये हैं, वैसे ही संयमी, विवेकशील नीतिवान आदि गणों से सम्पन्न व्यक्तियों को ही महत्त्वपूर्ण पदों पर स्थापित करने का परामर्श इस सत्र में दिया गया है। बिना परखे उच्च पदों पर प्रतिष्ठित मंत्री एवं अमात्य शासक को कभी भी धोखा दे सकते हैं। अत: शासक अपने सहयोगियों का चयन स्वयं परीक्षा करके करे।
सूत्र : नासहाय मंत्र निश्चयः ॥16॥
अन्वय: असहाय मंत्र निश्चयः न ।
अर्थ: अकेला शासक राज-कार्य के जटिल विषयों पर उचित निर्णय नहीं ले सकता।
विवचन: शासन व्यवस्था को सचारू रूप से चलाना आसान नहीं है। अनक प्रकार के अन्तर्देशीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर निर्णय लेने पड़ते है । एस। दुरूह तंत्र को सफलता पूर्वक चलाने के लिए सुयोग्य मंत्रि-परिषद् का आवश्यकता होती है। चाणक्य ने अमात्य, मंत्री एवं प्रोहित का नियुक्ति बड़ी सावधानी से करने की सलाह दी है।
सूत्र : नैकं चक्र परिभ्रमयति ॥17॥
अन्वय : एकं चक्रं न परिभ्रमयति ।
अर्थ : अकेले पहिये से गाड़ी नहीं चलती ।
विवेचन: जैसे रथ को चलाने के लिए दोनों पहियों की समान रूप से आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शासक एवं मंत्रिपरिषद्, राष्ट्र- रूपी गाड़ी के दो पहिये होते हैं । एकतंत्र राज्य का रथ सचारू रूप से नहीं चलता । मनमाने ढंग से राज्य व्यवस्था चलाने वाला शासक परे ढांचे को ही बिगाड़ देता है, एवं समाज- व्यवस्था अनुशासनहीन होकर बिखरने लगती है।
शासन व्यवस्था मात्र राजा का ही पारिवारिक मामला नहीं है । शासन-तंत्र में शासक, प्रजा, मंत्री एवं अधिकारी आदि सभी सम्मिलित होते हैं । अत: इन सभी के सम्मिलित प्रयास से ही शासन की गाड़ी आगे बढ़ती है। इन सभी का संतुलित सहयोग एवं शक्ति राजकार्य चलाने के लिए अनिवार्य है।
सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेक न वर्तते । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् ।। (अर्थशास्त्र) महामंत्री, सेनापति, कोषाध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश; ये चार राज्य के सर्वश्रेष्ठ नागरिक, सब प्रकार की सेनाओं के एक एक मुखिया, पुरोहित एवं अमात्य आदि सहायक कहलाते हैं। इन सभी के सहयोग से ही शासन चलता है।
सूत्र : सहायः समदुःखसुखः ॥18॥
अन्वय : सहाय सम दुःख सुखः ।
अर्थ : दुख और सुख में साथ देने वाले को सहायक कहा जाता
विवेचन: शासक के सहायक उसके मंत्री होते हैं । अन्य व्यक्ति भी सहायक हो सकते हैं । सुख-दुख में साथ देने वाले को सहायक कहा जाता है । दुख की घड़ी आने पर तटस्थ रहने वाला सहायक नहीं कहा जा सकता। शत्रु द्वारा अपने राज्य की आलोचना होने पर चुपचाप बैठने वाला व्यक्ति भी सहायक नहीं माना जा सकता । अपने शासक के दुःख को अपना दु:ख मानने वाला, एवं उसके सुख में सुख का अनुभव करने वाला व्यक्ति ही सहायक कहलाने का अधिकारी है शक्ति भेद से समशक्ति, हीन शक्ति सहायक कहलाने का अधिकारी है । तीन प्रकार के लोग सहायक हो सकते हैं,
सूत्र : मन्त्रमूला: सर्वारम्भाः ।।22।।
अन्वय : मन्त्र मूला: सर्व आरम्भाः ।
अर्थ : सभी प्रकार के कार्य 'मंत्र' अर्थात् सम्यक् सोच-विचार के उपरान्त ही आरम्भ किए जाएं।
विवेचन : ‘मन्त्र' का अर्थ है सम्यक् प्रकार से सोच-विचार कर लिए गये निर्णय । अर्थात् किसी भी योजना को प्रारम्भ करने से पहले उस विषय के विशेषज्ञों की सलाह लेना ही मंत्र कहलाता है । हर कार्य की सफलता का मूल सोच-विचार कर लिया गया निर्णय ही होता है । इसे ही आचार्य ने 'मंत्र' कहा है। शीघ्रता एवं बिना ठीक प्रकार से विचार किए बिना लिए गये निर्णय अनिष्टकारी होते हैं ।
अर्थशास्त्र में मंत्र के पाँच अंगों का वर्णन किया गया है।
1. कर्मों का आरम्भ और उनके उपाय ।
2. कर्मानुसार पुरुष एवं द्रव्यों का सम्पादन ।
3. देशकाल विभाग-समय एवं स्थानानुसार योजना को लागू करना ।
4. विनिपात प्रतिकार-सम्भावित विघ्नों को दूर करने का प्रावधान ।
5. कार्य सिद्ध-कार्य की सफलता ।
कार्य का मूल्यांकन उसकी उन्नति, अवनति तथा सम-अवस्था से किया जा सकता है । आवश्यकता अनुसार किसी भी योजना का इन तीन विधियों द्वारा मूल्यांकन किया जाता है ।
सूत्र : मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति ।।23।।
अन्वय : मन्त्ररक्षणे कार्य सिद्धिः भवति ।
अर्थ : मन्त्र को गुप्त रखने से कार्य सिद्धि होती हैं ।
विवेचन: शासक के अनेक कार्य ऐसे होते हैं, जिन्हें जब तक वे पूरे न हो जायें, गुप्त रखने में ही भलाई निहित रहती है। कार्य सिद्धि से पहले प्रकट-मंत्र में विघ्न पड़ने की आशंका बनी रहती है। शत्रु पक्ष हर दम बढ़ते हुए शासक की नीतियों एवं परियोजनाओं पर नजर रखा करता है। अत: परियोजनाओं की पूर्ति तक उन्हें शत्रु पक्ष की नजरों से बचाने में ही भलाई मानी गई है। 'मन्त्र के मूल में ही विजय रहती है ऐसा देवगुरु बृहस्पति का कथन है। चाणक्य ने मंत्र भेद करने वाले मंत्री के लिए मृत्युदण्ड का विधान किया है। अत: गोपनीय कार्यों की चर्चा मात्र प्रधानमंत्री के साथ ही की जानी चाहिए।
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